Thursday, 02 May 2019 10:56

ब्लैंक : सस्पेंस बरकरार है।

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फिल्म ब्लैंक का भी नाम सस्पेंस और थ्रिलर फिल्मों की केटेगरी में शामिल हो गया है। यह फिल्म देश से गद्दारी करने वाले वाले आंतकी को खत्म करने की कहानी पर आधारित है। फिल्म की कहानी तो अच्छी है लेकिन अगर थोड़ा और अच्छे से स्क्रिप्ट पर काम किया जाता तो इससे कई गुना ज्यादा अच्छी फिल्म बनाई जा सकती थी। फिल्म की कहानी एक गुंडा जो आतंकी बन जाता है, उसके नामोनिशान को मिटाने की है। फिल्म बाकी सस्पेंस और थ्रिलर फिल्मों की तरह है जो आखिर तक आपको बांधे रखती है। इसमें जबरदस्त एक्शन देखने को भी मिलता है।

फिल्म ब्लैंक से अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया के भतीजे और उनकी बहन सिंपल कपाड़िया के बेटे करण कपाड़िया को इंट्रोड्यूस किया गया है। इसमें करण ने एक्शन हीरो के तौर पर डेब्यू किया है। सस्पेंस फिल्म की शुरुआत से आखिर तक बना रहता है जो कि फिल्म की खास बात है। थ्रिल कंटेंट भी आपको बांधे रखेगा। कहानी की बात करें तो वो ऐसी है कि हनीफ (करण कपाड़िया) के पिता की निर्मम हत्या उसकी आंखों के सामने की जाती है जिसके कारण वह उस दृश्य को भुला नहीं पाता और बड़े होने के बाद भी उसे अपने पिता की हत्या के दृश्य दिखाई देते रहते हैं। इस कारण वह परेशान रहता है। इस दौरान उसे पुलिस और एंटी टेरेरिज्म स्क्वाड एटीएस से लड़ना पड़ता है। जांच में पता चलता है कि हनीफ के शरीर पर लगे बम के तार अन्य 24 लोगों के बम से जुड़े हैं और आतंकवादी मकसूद (जमील खान) जेहाद और जन्नत के नाम पर उनका इस्तेमाल करके शहर में 25 धमाके करके आतंक फैलाना चाहता है। हनीफ को एटीएस द्वारा पकड़ तो लिया जाता है लेकिन बचकर निकल जाता है। ऐसे में सस्पेंस इस बात को लेकर बरकरार रहता है कि हनीफ आतंक क्यों फैलाना चाहता है? हनीफ क्या देश से गद्दारी करता है? इन सवालों के जवाब फिल्म के आखिर में मिलते हैं। फिल्म में एटीएस चीफ एसएस दीवान का किरदार सनी देओल ने निभाया है। एसएस दीवान की टीम में हुस्ना (इशिता दत्ता) और रोहित (करणवीर शर्मा) होते हैं तो साथ मिलकर तफ्तीश करते हैं। 

 

अभिनय के बात करें तो पहली फिल्म में करण कपाड़िया ने बेहतरीन अभिनय किया है। भले ही करण की एंट्री बतौर रोमांटिक हीरो के जैसे न हुई हो लेकिन उन्होंने बतौर एक्शन हीरो अपना पूरा काम किया। सनी देओल हमेशा की तरह पॉवरपैक परफॉर्मेंस देते नजर आए। बीच-बीच में उनके डायलॉग्स और एक्शन देखने सुनने को मिलते हैं। इशिता दत्ता और करणवीर शर्मा ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया। आतंकी सरगना मकसूद के किरदार में जमील खान ने अपनी छाप छोड़ी है। आखिर में प्रमोशनल गीत अली अली में अक्षय कुमार और करण कपाड़िया नजर आते हैं जो कि फिल्म से बिल्कुल भी मेल खाता नजर नहीं आता। 

निर्देशन की बात करें तो बेहजाद खंबाटा सस्पेंस को आखिर तक बरकरार रखने में कामयाब रहे हैं। फिल्म को अगर और परफेक्शन के साथ बनाया जाता तो काफ़ी कुछ फ़र्क नज़र आ सकता था l स्टोरी थोड़ी और दमदार हो सकती थी।

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